रविवार, 8 सितंबर 2013

मध्यस्थता (उमेश कुमार गुप्ता)

                   मध्यस्थता (उमेश कुमार गुप्ता)
  मध्यस्थता के संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा-89 में विशेष प्रावधान दिये गये है । जिसमें न्यायालय के बाहर विवादो का निपटारा किया जाता है ।

                          1-        धारा-89 सिविल प्रक्रिया संहिता के अनुसार जहां न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि प्रकरण में किसी ऐसे समझौते के तत्व विद्यमान है जो दोनो पक्षकारो को स्वीकार्य हो सकता है वहां न्यायालय समझौते के निबंधन बनाएगा और उन्हें पक्षकारों को उनकी टीका टिप्पणी के लिए देगा और पक्षकारों की टीका टिप्पणी प्राप्त करने के पश्चात न्यायालय संभव समझौते के निबंधनपुनः तैयार कर सकेगा और उन्हें निम्न लिखित के लिए निर्दिष्ट करें-

    क-    माध्यस्थम्,
    ख-    सुलह,
    ग-    न्यायिक समझौते,जिसके अंतर्गत लोकअदालत के माध्यम से समझौता भी  शामिल है,
    घ-    बीच-बचाव,

वैकल्पिक न्यायिकेतर उपाय के सबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 10 में नियम 1क, 1ख, और 1ग जोडे गये है जो इस प्रकार है- 

    आदेश 10-1क----वैकल्पिक विवाद प्रस्ताव का कोई एक तरीका अपनाने का न्यायालय का निर्देश-स्वीकृति और इन्कार को लेखबद्ध करने के बाद न्यायालय वाद से संबंधित पक्षकारो को धरा-89 की उपधारा 1 में उल्लिखित न्यायाल से बाहर सुलह समझौता के किसी तरीके का विकल्प देने का निर्देश देगा । पक्षकारो के विकल्प देने पर, न्यायालय ऐसे न्यायमंच फोरम या प्राधिकारी के समक्ष उपस्थिति की तारीख नियत करेगा, जैसा पक्षकारों ने विकल्प दिया है ।

    आदेश 10-1ख----सुलह/समझौता न्यायमंच या प्राधिकारी के समक्ष उपस्थिति-जहंा नियम 1क के अधीन किसी वाद को संदर्भित किया गया हो तो उस वाद में सुलह करने के लिए पक्षकार उस अधिकरण न्यायमंच या प्राधिकारी के समक्ष  उपस्थित होगे।

    आदेश 10-1ग----सुलह के प्रयासो के असफल होने के परिणामस्वरूप न्यायालय के समक्ष  उपस्थिति- जहां नियम जहंा नियम 1क के अधीन किसी वाद को संदर्भित किया गया है और उस सुलह न्यायमंच या प्राधिकारी का समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में उस मामले में आगे बढना उचित नहीं होगा, तो वह उस मामले को वापस उस न्यायालय को संदर्भित करेगा और पक्षकारो को उसके द्वारा नियत दिनाक को न्यायालय के समक्ष  उपस्थित होने का निर्देश देगा ।

    क-    माध्यस्थम्- जहां कोई मामला कोई माध्यस्थ् या सुलह के लिए निर्दिष्ट किया गया है वहां माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम 1996 का 26 के उपबंध ऐसे लागू होंगे मानो माध्यस्थम् या सुलह के लिए कार्यवाहिया उस अधिनियम के उपबंधों के अधीन समझौते के लिए निर्दिष्ट की गई थीं, इस अधिनियम की धारा-73 के अनुसार निपटारे के तथ्य विद्यमान होने पर करार का निष्पादन किया जायेगा । 


    ख-    सुलह- सुलह के अंतर्गत कोई करार न होने की दशा में मामला किसी तीसरे पक्षकार के समक्ष सुलह हेतु भेजा जायेगा । इसके लिए आवश्यक है कि एक पक्षकार के निमंत्रण पर दूसरा पक्षकार लिखित में आमंत्रण स्वीकार करना चाहिए । सुलाह कर्ता का नियुक्ति सहमति से की जायेगी ।सुलहकर्ता विवादो को मेत्री पूर्ण ढंग से स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से निपटाने में सहयोग प्रदान करेगा । 


    ग-    न्यायिक समझौते जिसमें लोक अदालत भी शामिल है- न्यायालय प्रकरण को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 का 39 की धारा-20 की उपधारा- 1 के उपबंधों के अनुसार लोक अदालत को निर्दिष्ट करेगा और उस अधिनियम के सभी अन्य उपबंध लोक अदालतों को इस प्रकार निर्दिष्टि किए गए विवाद के संबंध में लागू होंगे, जहां न्यायिक समझौते के लिए निर्दिष्ट किया गया है, वहां न्यायालय उसे किसी उपयुक्त संस्था या व्यक्ति को निर्दिष्ट करेगा और ऐसी संस्था या व्यक्ति लोक अदालत समझा जाएगा तथा विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 का 39 के सभी उपबंध ऐसे लागू होंगे मानो वह विवाद लोक अदालत को उस अधिनियम के उपबंधों के अधीन निर्दिष्ट किया गया था, 

        लोक अदालत का प्रत्येक अधिनिर्णय  विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 का 39 अधिनियम की धारा-21 के अंतर्गत किसी सिविल न्यायालय की एक डिक्री माना जायेगा ।


    घ-    बीच-बचाव-बीच बचाव के लिए निर्दिष्ट किया गया है, वहां न्यायालय पक्षकारो के बीच समझौता राजीनामा कराएगा और ऐसी प्रक्रिया का पालन करेगा जो विहित की जाए।

        इस प्रकार धारा-89 सहपठित आदेश 10 नियम 1क, 1ख, 1ग, मंे न्यायालय के बाहर समझौता या राजीनामा के आधार पर विवाद निपटाने की नवीन व्यवस्था की गई है जिसमें मुकदमे बाजी को कम समय में आपसी मेल जोल के वातावरण में सद्भावना पूर्वक विवाद को निपटाया जाता है । धारा-89 के अंतर्गत राजीनामा समझौते से जो मामले निपटते है उनमें वादी को पूरी न्यायशुल्क की पूरी राशि वापिस की जाती है । इस संबंध में विधिक सेवा प्राधिकरण 1987 की धारा-20-1 के अनुसार किसी लोक अदालत में द्वारा कोई समझौता या परिनिर्धारण कियाजाता है तो ऐसे मामले में संदत्त न्यायालय फीस, न्यायालय फीस अधिनियम 1870 का 7 के अधिन उपबंधित रीति में वापस की जायेगी । इस संबंध में न्यायालय जिला कलेक्टर को प्रमाण पत्र जारी करेगा।


        मध्यस्थता धारा-89 के अंतर्गत सुलाह समझौते का एक महत्वपूर्ण आधार है । जिसके संबंध में मान्नीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा एस.एल.पी.नंबर-6000/2010 सी नंबर-760/2007 एफकाॅम इन्फ्रास्ट््रेेक्चर लिमि. विरूद्ध चेरियर वारके कार्पोरेशन प्राईवेट लिमि.2010 भाग-8 एस.एस.सी.24 के मामले में अभिनिर्धारित किया है कि यह एक महत्वपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया है जिसका पालन कराया जाना राजीनामा वाले मामलो में अनिवार्य है । इस मामले में भी ऐसे मामलो की सूचि दी गई है जिनमें मध्यस्थ के मामले की प्रक्रिया का पालन कराया जाना चाहिए और यह भी बताया गया कि किन मामलो में इसका पालन आवश्यक नही है ।


                              
        मध्यस्थता सुलह कि वह अबाद्धकारी, गोपनीय, सस्ती, अनऔपचारिक, किफायती प्रक्रिया है । जिसमें मध्यस्थ, तटस्थ, निष्पक्ष होकर गोपनीय तथ्यों को गोपनीय रखते हुए विवाद को हल करने का आधार भूत रास्ता उपलब्ध कराता है । इसमें पक्षकारो के द्वारा सुझाये गये रास्तो से ही विवाद का हल निकाला जाता है।  मध्यस्थ के द्वारा उन पर समझौता आरोपित नहीं किया जाता है। इसमें दोनो पक्षकारो की जीत होती है । कोई भी पक्षकार अपने को हारा हुआ या ठगा महसूस नहीं करता है।

         मध्यस्थता बातचीत की एक प्रक्रिया है जिसमें एक निष्पक्ष  मध्यस्थता अधिकारी विवाद और झगडे में लिप्त पक्षांे के बीच सुलह कराने में मदद करता है । यह  मध्यस्थता अधिकारी बातचीत की विशेष शैली और सूचना विधि का प्रयोग करते हुए समझौते का आधार तैयार करता है तथ वादी और प्रतिवादी को समझौते के द्वारा विवाद समाप्त करने के लिए प्रेरित करता है। 

         मध्यस्थता विवादो को निपटाने के लिए मुकदमेबाजी की तुलना में कहीं अधिक संतोषजनक तरीका है । जिसके माध्यम से निपटाये गए मामलो में अपील और पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं होती है और सभी विवाद पूरी तरह निपट जाते हैं। इस पद्धति के द्वारा विवादोें का जल्द से जल्द निपटारा होता है जो कि खर्च रहित है । यह मुकदमो के झंझटो से मुक्त है । साथ ही साथ न्यायालयों पर बढते मुकदमों का बोझ भी कम होता है । 

         मध्यस्थता विवादो को निपटाने की  सरल एव् निष्पक्ष आधुनिक प्रक्रिया है। इसके द्वारा  मध्यस्थ अधिकारी दबावरहित वातावरण में विभिन्न पक्षों के विवादो का निपटारा करते है। सभी पक्ष अपनी इच्छा से सद्भावपूर्ण वातावरण में विवाद का समाधान निकालते हैं। उसे स्वेच्छा से अपनाते है ।  मध्यस्थता के दौरान विभिन्न पक्ष  अपने विवाद को जिस तरीके से निपटाते हैं वह सभी पक्षों को मान्य होता है, वे उसे  अपनाते है । 
 
        मध्यस्थता में मामले सुलाह, समझौते, समझाइश, सलाह के आधार पर निपटते हैं दोनो पक्ष जिस ढंग से विवाद सुलझाना चाहते है उसी ढंग से विवाद का निराकरण किया जाता है। इसमें विवाद की जड तक पहंुचकर विवाद के कारणों का पता लगाकर विवाद का हल निकाला जाता है ।

         मध्यस्थता माध्यस्थम् से अलग है । माध्यस्थम् में दोनो पक्षकार को सुनकर विवाद का हल निकाला जाता है । इसके लिए करार में माध्यस्थम् की शर्त होना अनिवार्य है। माध्यस्थम् में विवाद से बाहर की विषय वस्तु पर विचार नहीं किया जाता है और न ही उसके आधार पर विवाद का निराकरणा किया जा सकता है ।

        मध्यस्थता पंचायत से भी अलग है। पंचायत में समाज में व्याप्त रूढियों, प्रथाओं, मान्यताओं, को ध्यान में रखते हुए निर्णय जबरदस्ती पक्षकारो पर थोपे जाते हैं। पंचायत में सामाजिक प्रथाओ को ध्यान मंे रखकर दबाव वश निर्णय लिये जाते हैं । समस्या की जड तक पहंुचकर समस्या को जड से समाप्त नहीं किया जाता है । 

         मध्यस्थता लोक अदालत से भी अलग है । लोक अदालत में कानून के अनुसार केवल राजीनामा योग्य मामले रखे जाते हैं । इसमे पक्षकारो का सामाजिक आर्थिक हित होते हुए भी कानून में प्रावधान न होने के कारण कोई सहायता प्रदान नहीं की जा सकती। केवल कानून के दायरे में रहते ही लोक अदालत में निर्णय पारित किया जाता है ।

        मध्यस्थता न्यायिक सुलह से भी अलग है ।न्यायिक सुलह में सुलहकर्ता न्यायिक दायरे मंे रहते हुए दोनो पक्षकारो को सुनकर विवाद का हल बताता है । जो प्रचलित कानून की सीमा के अंतर्गत होता है ।

         मध्यस्थता समझौते से भी अलग है। समझौते में किसी पक्षकार को कुछ मिलता है । किसी को कुछ त्यागना पडता है । किसी को परिस्थितिवश समझौता करना पडता है । इसमें दोनो पक्षकार संतुष्ट नहीं होते है । एक न एक पक्षकार असंतुष्ट बना रहता है ।\

         मध्यस्थता में जो रास्ते उपलब्ध है उन्हीं रास्ते में समस्या  का हल निकाला जाता है। मध्यस्थता में व्यक्तिगत राय  मध्यस्थ नही थोपता है । न ही कानून बताकर कानून के अनुसार कानून के दायरे में रहकर समस्या का हल निकालने को कहा जाता है । इसमें वैकल्पिक न्यायिक उपचार निकाले जाते है जो विवाद से संबंधित भी हो सकते हैं और विवाद की विषय वस्तु से अलग भी हो सकते हैं । इसमें वैचारिक मत भेद समाप्त कर दोनो पक्षकारो को पूर्ण संतोष एंव पूर्ण संतुष्टि प्रदान की जाती है ।

        मध्यस्थता में मध्यस्थ तठस्थ रहकर विवादों का निराकरण करवाता है । इसमें गोपनीयता महत्वपूर्ण है । किसी भी पक्षकार की गोपनीय तथ्य बिना उसकी सहमति के दूसरे पक्ष को नहीं बताये जाते हैं । इसमें तठस्थता भी महत्वपूर्ण है । तठस्थ रहकर बिना किसी पक्षकार का पक्ष लिए समझौते का हल निकाला जाता है । इसमें  मध्यस्थ के द्वारा कोई पहल नही की जाती है, कोई सुझाव नही दिया जाता है। दोनो पक्षों की बातचीत के आधार पर हल निकाला जाता है।

        मध्यस्थता के निम्नलिखित चार चरण हैंः-

    1.    परिचय- मध्यस्थता में सर्व प्रथम पक्षकारो का परिचय लिया जाता है । परिचय के दौरान पक्षकारो को मध्यस्थता के आधारभूत सिद्धात बताये जाते है जिसमें मध्यस्थता के फायदे, गोपनीय तथ्यों को गोपनीय रखे जाने, सस्ता सुलभ शीघ्र न्याय प्राप्त होने, न्यायशुल्क की वापसी होने आदि बाते बताई जाती है । 

    2.    संयुक्त सत्र-परिचय के बाद संयुक्त सत्र में दोनो पक्षों को उनके अधिवक्ताओ के साथ आमने सामने बैठाकर क्रम से उनका पक्ष सुना जाता है। इसमें पक्षकारो कोआपस में वाद विवाद करने, लडने की मनाही रहती है। स्वस्थ वातावरण में दोनो पक्षों की बातचीत  मध्यस्थ सुनता है । इसमें बिना  मध्यस्थ की अनुमति के दोनो पक्षकार आपस में वाद विवाद नहीं कर सकते है जो भी बात कहनी है वह  मध्यस्थ के माध्यम से कही जायेगी। इसमें विवाद के प्रति जानकारी प्राप्त की जाती है एंव विवाद के निपटारे के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जाता है ।

    3.    पृथक सत्र- संयुक्त सत्र के बाद अलग सत्र होता है जिसमें एक एक पक्षकार को उनके अधिवक्ताओ के साथ अलग-अलग सुना जाता है । इसमें  मध्यस्थ तथ्यों की जानकारी एकत्र करता है । पक्षकारो की गोपनीय बाते सुनता समझता है ।झगडे के कारणो से अवगत होता है । समस्या का यदि कोई हल हो तो वह खुद पक्ष्कार  मध्यस्थ को बताते है । इस सत्र में मध्यस्थ अधिकारी विवाद की जड तक पहुंचता हैं । 

    4.    समझौता-विवाद के निवारण उपरांत मध्यस्थ अधिकारी सभी पक्षों से समझौते की पुष्टि करवाता है तथा उसकी शर्ते स्पष्ट करवाता है । इस समझौते को लिखित रूप से अंकित किया जाता है ।जिस पर सभी पक्ष अधिवक्ताओं सहित हस्ताक्षर करते हैं ।        

            मध्यस्थ अधिकारी की भूमिका और कार्य

        मध्यस्थ अधिकारी विवादित पक्षों के बीच समझौते की आधार भूमि तैयार करता है। पक्षकारो के बीच आपसी बातचीत और विचारो का माध्यम बनता है । समझौते के दौरान आने वाली बाधाओं का पता लगाता है । बातचीत से उत्पन्न विभिन्न समीकरणों को पक्षों के समक्ष रखता है ।सभी पक्षों के हितों की पहचान करवाता है । समझौते की शर्ते स्पष्ट करवाता है तथा ऐसी व्यवस्था करता है कि सभी पक्ष स्वेच्छा से समझौते को अपना सके ।

        एक मध्यस्थ फैसला नहीं करता क्या न्याससंगत और उपयुक्त है, संविभाजित निन्दा नहीं करता, ना ही किसी गुण या सफलता को संभावना की राय देता है । 

        एक मध्यस्थ उत्प्रेरक की तरह दोनो पक्षों को एक साथ लाकर परिणामों की व्याख्या करके एंव बाधाओ को सीमित करते हुए विचार विमर्श द्वारा समझौता कराने का कार्य करता है।

        इस प्रकार मध्यस्थ का कर्तव्य है कि वह पक्षकारो गलत फहमी से निकाले

        मध्यस्थता के लिए उपयुक्त मामलो में जैसे


        1. दीवानी मामले, निषेधादेश या समादेश, विशिष्ट निष्पादन, दीवानी वसूली, मकान मालिक किरायेदार के मामले, बेदखली के मामले,
        2. श्रमिक विवाद
        3. मोटर दुर्घटना दावे,
        4. वैवाहिक मामले, बच्चो की अभिरक्षा के मामले, भरण-पोषण के मामले,
        5. अपराधिक मामले, जिनमें धारा-406,498ए भा.द.वि. एंव. पराक्रम लिखत अधि  नियम की धारा-138 के मामले, धारा-125 दं.प्र.स. भरण-पोषण के
          मामले,

    निम्नलिखित मामले मध्यस्थता हेतु उपयुक्त नहीं पाये गयेः-


        1. लोकहित मामले,
        2. ऐसे मामले जिनमें शासन एक तरफ से पक्षकार है ।
        3. आराजीनामा योग्य धारा-320 द.प्र.सं. के अवर्णित मामले

         प्रत्येक प्रकरण में मध्यस्थ की प्रक्रिया अनिवार्य है लेकिन यदि आवश्यक तत्व न हो तो  मध्यस्थ को भेजा जाना प्रकरण को आवश्यक नहीं है । इसमें पक्षकारो के मध्य विभिन्न कोर्ट में लंबित सभी मामले एक साथ निपटते हैं । कोर्ट फीस वापिस होती है । आदेश की अपील नहीं होती है । 

        मध्य प्रदेश शासन के द्वारा इस सबंध में 30.082006 के राजपत्र मंे नियम प्रकाशित किये गये हैं । दोनो पक्ष आपसी सहमति से एक मध्यस्थ को नियुक्त कर सकते है या मध्यस्थ द्वारा एक  मध्यस्थ विचाराधीन वाद के लिए नियुक्त किया जा सकता है।  मध्यस्थता हमेशा निर्णय लेने की क्षमता दोनो पक्षों को सौंप देती है । 

        सर्व प्रथम प्रत्येक जिले में एक मध्यस्थ केन्द्र की स्थापना की जायेगी । जिसका प्रभारी अधिकारी ए.डी.जे. स्तर का होगा । मध्यस्थ के लिए उपर्युक्त मामला पाये जाने पर संबंधित न्यायाधीश एक संक्षिप्त जानकारी सहित मामला मध्यस्थ जिले मे स्थापित मध्यस्थ केन्द्र के प्रभारी अधिकारी को भेजेगा । प्रभारी अधिकारी राष्ट््रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के  द्वारा नियुक्त एंव मान्यता प्राप्त मध्यस्थ को मामला सुपुर्द करेगा । 

        पक्षकारों को मध्यस्थ केन्द्र में उपस्थित होने की तारीख संबंधित न्यायाधीश   द्वारा दी जायेगी । मध्यस्थ द्वारा 60 के अंदर मामले को निराकृत करने का प्रयास किया जायेगा। पक्षकारो के विशेष अनुरोध पर 30 दिन ओर समयावधि बढाई जा सकती है । 90 दिन से ज्यादा समय मध्यस्थ कार्यवाही हेतु नहीं दिया जायेगा ।

        समझौता होने पर ज्ञापन मध्यस्थ कार्यालय में अभिलिखित किया जायेगा जिस पर केस नंबर, मध्यस्थ केन्द्र का केस नंबर, पक्षकारो के नाम, शर्तो का उल्लेख होगा और उस पर मध्यस्थ सहित सभी पक्षकार अधिवक्ताओ के हस्ताक्षर होगें । एक-एक प्रतिलिपि दोनो पक्षकारो को दी जायेगी । जो न्यायालय में प्रस्तुत करेंगे । तथा मध्यस्थ भी समझौते की एक प्रति न्यायालय को सीधे भेजेगी । न्यायालय विधि अनुसार समझौते के अनुसरण में समझौता डिक्री पारित करेगा । जिसकी अपील नही होगी ।




        जगदीश प्रसाद विरूद्ध संगम लाल आई.एल.आर. 2011 मध्य प्रदेश 3011 में अभिनिर्धारित किया गया है कि प्रत्येक लोक अदालत का अधिनिर्णय लिगल सर्विस अधार्टी एक्ट 1987 की धारा-20 और 21 के अंतर्गत सिविल न्यायालय की डिक्री की श्रेणी में आता है ।

        रमेशचंद विरूद्ध स्टेट आफ एम.पी. आई एल.आर. 2012 मध्य प्रदेश 320 में अभिनिर्धारित कियागयाहै कि धारा-35 कोर्ट फीस अधिनियम के अंतर्गत लोक अदालत में राजी नामा होने पर सम्पूर्ण राशि वापिस की जायेगी और लोक अदालत का निर्णय धारा-21 के अंतर्गत डिक्री की श्रेणी में आता है ।


                                      मध्यस्थ निर्देशन आदेश
   


       न्यायालय ------------------------------------------------------- म0प्र0
                    मध्यस्थ निर्देशन आदेश
                             प्रकरण क्रमांक-

                  
    आवेदक                             अनावेदक
                        
क्रमांक-1.     नाम                    क्रमांक-1.     नाम  
           पता            विरूद्व                पता

क्रमांक-2    नाम                    क्रमांक-2.     नाम
        पता                            पता
.


विषयः--------------------------------------------

    -------------------------------------------

01.        यह कि न्यायालय के समक्ष पक्षकारो ने धारा 89 आदेश-1 नियम-10ए व्य0प्र0सं0 के अंतर्गत प्रकरण मध्यस्थ केन्द्र में मध्यस्था हेतु भेजने में अपनी सहमति व्यक्त की है ।
02.        यह कि आवेदक ------एंव अनावेदक---------अपने अधिवक्ताओं सहित मध्यस्थ केन्द्र रायसेन में सुसंगत दस्तावेज एंव सामग्री सहित दिनांक------  को उपस्थित होगें जहां पर उन्हें बताया जावेगा कि उनके प्रकरण में कौन मध्यस्था करेगा ।
03.        यह कि सुनवाई प्रशिक्षित एडवोकेट/जज मध्यस्थ द्वारा की जावेगी। जिसका इस कार्यवाही की मैरिट पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा । मध्यस्थ के दौरान जो बाते पक्षकारो  द्वारा प्रकट की जावेगी वह सर्वथा गोपनीय रखी जावेगी । उन बातो को मध्यस्थ कार्यवाही समाप्त होने पर किसी भी न्यायालय अथवा अन्य कार्यवाही में प्रश्नगत नहीं किया जावेगा ।
04.        यह कि मध्यस्थ के पक्षकारो सहित उनके अधिवक्ता गोपनीय रूप से कार्य करने की शपथ लेते हैं । यदि गोपनीयता भंग की जाती है तो इस संबंध में अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकेगी ।
05.        यह कि मध्यस्थ कार्यवाही के दौरान जो भी हल दोनो की सहमति से निकलेगा वह संयुक्त रूप से हस्ताक्षरित दिनांकित कर इस न्यायालय को अंतिम आदेश पारित करने के लिये भेजा जावेगा ।
06.        यह कि मध्यस्थ कार्यवाही के लिए 60 दिन नियत किये जाते हैं । यदि 60 दिन में कार्यवाही पूरी नहीं होती है तो पक्षकारों द्वारा इस न्यायालय के समक्ष  आवेदन किये जाने पर 30 दिन की म्याद ओर बढ़ाई जा सकेगी ।

दिनांक-
स्थान- रायसेन ।

                                हस्ताक्षर/-
                            मध्यस्थ निर्देशन न्यायाधीश


    हस्ताक्षर/-                        हस्ताक्षर/-
    नाम                            नाम
    आवेदक                         अनावेदक


    हस्ताक्षर/-                        हस्ताक्षर/-
    नाम                            नाम-
    आवेदक अधिवक्ता                 अनावेदक अधिवक्ता


प्रतिलिपिः-
    1-    प्रभारी मध्यस्थता केन्द्र     
    2-    सचिव विधिक सेवा प्राधिकरण



  

बुधवार, 7 अगस्त 2013

मध्यस्थ निर्देशन आदेश


न्यायालय- प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश रायसेन म0प्र0
                    मध्यस्थ निर्देशन आदेश
                             प्रकरण क्रमांक-

                  
    आवेदक                             अनावेदक
                        
क्रमांक-1.     नाम                    क्रमांक-1.     नाम  
           पता            विरूद्व                पता

क्रमांक-2    नाम                    क्रमांक-2.     नाम
        पता                            पता
.


विषयः--------------------------------------------

    -------------------------------------------

01.        यह कि न्यायालय के समक्ष पक्षकारो ने धारा 89 आदेश-1 नियम-10ए व्य0प्र0सं0 के अंतर्गत प्रकरण मध्यस्थ केन्द्र में मध्यस्था हेतु भेजने में अपनी सहमति व्यक्त की है ।
02.        यह कि आवेदक ------एंव अनावेदक---------अपने अधिवक्ताओं सहित मध्यस्थ केन्द्र रायसेन में सुसंगत दस्तावेज एंव सामग्री सहित दिनांक------  को उपस्थित होगें जहां पर उन्हें बताया जावेगा कि उनके प्रकरण में कौन मध्यस्था करेगा ।
03.        यह कि सुनवाई प्रशिक्षित एडवोकेट/जज मध्यस्थ द्वारा की जावेगी। जिसका इस कार्यवाही की मैरिट पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा । मध्यस्थ के दौरान जो बाते पक्षकारो  द्वारा प्रकट की जावेगी वह सर्वथा गोपनीय रखी जावेगी । उन बातो को मध्यस्थ कार्यवाही समाप्त होने पर किसी भी न्यायालय अथवा अन्य कार्यवाही में प्रश्नगत नहीं किया जावेगा ।
04.        यह कि मध्यस्थ के पक्षकारो सहित उनके अधिवक्ता गोपनीय रूप से कार्य करने की शपथ लेते हैं । यदि गोपनीयता भंग की जाती है तो इस संबंध में अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकेगी ।
05.        यह कि मध्यस्थ कार्यवाही के दौरान जो भी हल दोनो की सहमति से निकलेगा वह संयुक्त रूप से हस्ताक्षरित दिनांकित कर इस न्यायालय को अंतिम आदेश पारित करने के लिये भेजा जावेगा ।
06.        यह कि मध्यस्थ कार्यवाही के लिए 60 दिन नियत किये जाते हैं । यदि 60 दिन में कार्यवाही पूरी नहीं होती है तो पक्षकारों द्वारा इस न्यायालय के समक्ष  आवेदन किये जाने पर 30 दिन की म्याद ओर बढ़ाई जा सकेगी ।

दिनांक-
स्थान- रायसेन ।

                                हस्ताक्षर/-
                            मध्यस्थ निर्देशन न्यायाधीश


    हस्ताक्षर/-                        हस्ताक्षर/-
    नाम                            नाम
    आवेदक                         अनावेदक


    हस्ताक्षर/-                        हस्ताक्षर/-
    नाम                            नाम-
    आवेदक अधिवक्ता                 अनावेदक अधिवक्ता


प्रतिलिपिः-
    1-    प्रभारी मध्यस्थता केन्द्र रायसेन ।          
    2-    सचिव विधिक सेवा प्राधिकरण रायसेन ।




महात्मा गांधी मुझे कानून के बीस वर्ष के अभ्यास के दौरान मनुष्य के दिल की बात जानने का एहसास हुआ है । इन बीस वर्षो में मैने सैकडो केसों में समझौता कराए हैं जिसमें मैने अपनी आत्मा को पाया है । कुछ भी नहीं खोया है । पैसे का भी नुकसान नहीं हुआ है ।

                  महात्मा गांधी

                                           मुझे कानून के बीस वर्ष के अभ्यास के दौरान मनुष्य के दिल की बात जानने का एहसास हुआ है । इन बीस वर्षो में मैने सैकडो केसों में समझौता कराए हैं जिसमें मैने अपनी आत्मा को पाया है । कुछ भी नहीं खोया है । पैसे का भी नुकसान नहीं हुआ है ।




न्याय तक पहुंच-कितने दूर कितने पास उमेश कुमार गुप्ता

          न्याय तक पहुंच-कितने दूर कितने पास
                                                    उमेश कुमार गुप्ता
                                                              भारत दुनिया का सबसे बडा लोकतंात्रिक राज्य है । जहां पर जनता में से जनता द्वारा, जनता के लिए प्रतिनिधि चुनकर आते हैं । देश में प्रत्येक व्यक्ति सरकार चुनने में भागीदार होता है और वह लोकतंत्र का आधार पर स्तभ होता है उसके ही बोट से चुनकर लोक प्रतिनिध् आते हैं। जो सरकार चलाते हैं 

                                                   लेकिन हमारे देश में सरकार चुनने वाला व्यक्ति ही सबसे ज्यादा उपेक्षित समाज में रहता है । उसे अपने कल्याण के लिये प्रचलित समाजिक आर्थिक कानून की जानकारी नहीं होती है । वह कानूनी अज्ञानता के कारण उसके हित के लिए चल रही सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विकास की योजनाओं की जानकारी प्राप्त नहीं कर पाता है । इसलिए न्याय की पहुच से दूर रहता हैं ।

                                                                                       प्रत्येक व्यक्ति की न्याय तक पहुंच हो। इसके लिये आवश्यक है कि दैनिक जीवन मं उपयोग हो रहे कानून की जानकारी सर्व साधारण को होना चाहिए। लेकिन हमारे देश में अशिक्षा,अज्ञानता और विधिक साक्षरता की कमी के कारणलोगो को अपने अधिकार,कर्तव्य, की जानकारी नहीं होती है । इसलिए वह न्याय तक पहंच से दूर रहते हैं । 

 
                                                                                                न्याय तक पहुंचने का अधिकार संबिधान के अनुच्छेद- 21 में प्रदत्त प्राण एंव दैेहिक स्वतंत्रता के अधिकार में शामिल है। जिसे मान्नीय सर्वोच्य न्यायालय द्वारा हुसैन आरा खातून ,डी0 के0बोस, मैनका गांधी आदि सेकड़ो मामलों प्रतिपादित किया गया है । इसके बाद भी समाज का कमजोर वर्ग उपेक्षित है । न्याय तक पहुंच का अधिकार उससे सैकडो मील दूर है । 

 
                                                                     हमारे संबिधान में निशुल्क विधिक सहायता का प्रावधान रखा गया है । जिसके लिये केन्द्र, राज्य, तालुका स्तर पर केन्द्र, राज्य, और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण स्थापित है। जो पक्षकारो को निःशुल्क विधिक सेवा,सहायता हर स्तर पर उपलब्ध कराते है। लेकिन यह संस्थाऐं केवल उन व्यक्तियों को सहायता प्रदान करती हैं जो इन संस्थाओ तक पहंुच रखते हैं जो व्यक्ति न्यायालय आते हैं उन्ही तक यह संस्थाएं सीमित है । 
 
                                                                               लेकिन जो व्यक्ति घर पर गरीबी, अज्ञानता, के कारण बैठा हुआ है। जिसे कानून की सहायता की जरूरत है । उसे निःशुल्क कानूनी मदद चाहिये। वह अपने घर से न्यायालय तक आने में सहायता असमर्थ है । उसे घर से न्यायालय तक न्याय पहंुचाने के लिए कोई संस्था ,समिति ,प्राधिकरण कार्यरत नहीं है। इसी कारण लोगो की न्याय तक पहंुच में दूरी बनी हुई है ।

                                                              हमारे देश में 50 प्रतिशत से अधिक आबादी अनपढ़ है ,करोड़ो रूपये खर्च करने के बाद भी साक्षरता के नाम पर केबल कुछ प्रतिशत लोग नाम लिखने वाले है । कुछ प्रतिशत लोग गावं में साक्षर हैं । देश में युवा पीढी को छोड दे तो जो प्रोढ पीढी,पूरी तरह से निरक्षर है । जिनका अंगूठा लगाना शैक्षणिक मजबूरी है । ऐसी स्थिति में देश में विधिक साक्षरता जरूरी हैं । इसके लिए आवश्यक है कि देश की प्रौढ़ पीढ़ी को विधिक साक्षरता प्रदान की जाये । 

 
                                                         हमारे देश में विभिन्न विषयो पर अलग अलग कानून, अधिनियम, नियम प्रचलित है । ब्रिटिश काल का कानून अभी भी प्रचलित है । अधिकांश कानून और उसके संबंध मे ंप्रतिपादित दिशा निर्देश अंग्रेजी में विद्यमान है । इसके कारण देश की अधिकाशं जनता को इनका ज्ञान नहीं हो पाता है । इसलिए महिला, बच्चे, प्रौढ़, बुजुर्गो से संबंिधत कानून को एक ही जगह एकत्रित कर उन्हें लोगों के समक्ष रखा जावे तो कानून की जानकारी उन्हें शीघ्र और सरलता से प्राप्त हो सकती है ।

                                                            हमारे संविधान में हमे मूल अधिकार प्रदान किये गये है । जो प्रत्येक व्यक्ति को मानवता का बोध कराते हैं । प्रत्येक ्रव्यक्ति का मूल अधिकार है कि वह उत्कृष्ट जीवन जिये ।उसे शिक्षा, स्वास्थ, आवास, रोजगार, प्राप्त है । उसके साथ राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अन्याय न हो । मानवीय स्वतंत्रता एंव गरिमा के अनुरूप उसे मानव अधिकार प्राप्त हो । जिसके लिए आवश्यक है कि उसकी न्याय तक पहंुच हो । उसे अपने अधिकारो की जानकारी हो ।
                                                              भारत का सबिधान देश के सभी नागरिकों के लिए अवसर,और पद की समानता प्रदान करता है । उसे विचार अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रता प्रदान करता है। लेकिन इसके बाद भी लोगो को अपने कानूनी अधिकारो की जानकारी नहीं हो पाती । आज प्रत्येक व्यक्ति उपभोक्ता है । वह प्रतिफल के बदले में सेवा प्राप्त करता है।लेकिन कदम-कदम पर जानकारी न होने के कारण ठगा जाता है। इसके लिये जरूरी है कि उपभेक्ता प्रचलित कानून और अपने अधिकारों को जाने ।
 
                                                                    इन संबैधानिक अधिकारों के अतिरिक्त सरकार ने उपेक्षित लोगों के लिए सरकार समर्थित अनुदानो को सुनिश्चित करने के लिये विशेष योजनाएं बनाई है और उनके क्रियान्वयन के लिए कानून बनाकर उन्हें अधिकार के रूप में प्रदान किया है। जिनकी जानकारी आम जनता को नहीं है। यदि उन कानून की जानकारी उन्हें दी जावे तो उनके जीवन की रक्षा होगी, उन्हें उचित संरक्षण प्राप्त होगा । उन्हें सामाजिक ,आर्थिक और राजनैतिक लाभ प्राप्त होगा 
 
                                                                 शिक्षा, रोजगार, आहार, आवास, सूचना को मूल अधिकार मानते हुए सूचना अधिकार अधिनियम, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी योजन, अनिवार्य शिक्षा का अधिकार, खाद्य सुरक्षा बिल, आदि ये सभी कानून समाज के सबसे कमजोर, उपेक्षित वर्ग के, विकास के लिए बनाये गये हैं । जो उन्हें सामाजिक न्याय, आर्थिक सुरक्षा , राजनैतिक संरक्षण प्रदान करते हैं ।

 
                                                                     इतने प्रगतिशील कानूनो के बावजूद और प्रतिवर्ष लाखो कऱोड़ रूपये साक्षरता की रोश्नी जगाने, गरीबी दूर करने बेकारी मिटाने में खर्च किये जाते हैं । इसके बावजूद भी अति उपेक्षित लोग, विशेषकर महिलाऐं, बच्चे, अनुसूचित जाति-जन जाति, पिछडा वर्ग के सदस्य, अपने जायज हकों को प्राप्त नहीं कर पाते हैं ।

                                                           एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत के लगभग सत्तर प्रतिशत लोग संविधान मंे दिये गये अधिकार,कर्तव्य, के प्रति जागरूक नहीं है, या उनके पास औपचारिक संस्थाओं के माध्यम से न्याय प्राप्त करने के संसाधन ही नहीं है। शिक्षा के अभाव, अथवा कानून की जानकारी न होने के कारण वे लोग मुख्य धारा से कटे रहते है ।

 
                                                इसके लिए आवश्यक है कि उन्हें कानून की सही जानकारी दे कर उनके अधिकार और कर्तव्यों के प्रति सचेत किया जाये । कानूनी साक्षरता का प्रचार-प्रसार किया जाये। एक न्याय तक पहंुच वाले सुदृढ़ एंव विकसित समाज की संरचना की जावें ।






mediation मध्यस्थता (उमेश कुमार गुप्ता)

रविवार, 4 अगस्त 2013

मध्यस्थता (उमेश कुमार गुप्ता)

                                                                            मध्यस्थता


                                                       मध्यस्थता सुलह कि वह अबाद्धकारी, गोपनीय, सस्ती, अनऔपचारिक, किफायती प्रक्रिया है । जिसमें मध्यस्थ, तटस्थ, निष्पक्ष होकर गोपनीय तथ्यों को गोपनीय रखते हुए विवाद को हल करने का आधार भूत रास्ता उपलब्ध कराता है । इसमें पक्षकारो के द्वारा सुझाये गये रास्तो से ही विवाद का हल निकाला जाता है।  मध्यस्थ के द्वारा उन पर समझौता आरोपित नहीं किया जाता है। इसमें दोनो पक्षकारो की जीत होती है । कोई भी पक्षकार अपने को हारा हुआ या ठगा महसूस नहीं करता है।


                                     मध्यस्थता बातचीत की एक प्रक्रिया है जिसमें एक निष्पक्ष  मध्यस्थता अधिकारी विवाद और झगडे में लिप्त पक्षांे के बीच सुलह कराने में मदद करता है । यह  मध्यस्थता अधिकारी बातचीत की विशेष शैली और सूचना विधि का प्रयोग करते हुए समझौते का आधार तैयार करता है तथ वादी और प्रतिवादी को समझौते के द्वारा विवाद समाप्त करने के लिए प्रेरित करता है। 


                                      मध्यस्थता विवादो को निपटाने के लिए मुकदमेबाजी की तुलना में कहीं अधिक संतोषजनक तरीका है । जिसके माध्यम से निपटाये गए मामलो में अपील और पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं होती है और सभी विवाद पूरी तरह निपट जाते हैं। इस पद्धति के द्वारा विवादोें का जल्द से जल्द निपटारा होता है जो कि खर्च रहित है । यह मुकदमो के झंझटो से मुक्त है । साथ ही साथ न्यायालयों पर बढते मुकदमों का बोझ भी कम होता है । 


                                 मध्यस्थता विवादो को निपटाने की  सरल एव् निष्पक्ष आधुनिक प्रक्रिया है। इसके द्वारा  मध्यस्थ अधिकारी दबावरहित वातावरण में विभिन्न पक्षों के विवादो का निपटारा करते है । सभी पक्ष अपनी इच्छा से सद्भावपूर्ण वातावरण में विवाद का समाधान निकालते हैं। उसे स्वेच्छा से अपनाते है ।  मध्यस्थता के दौरान विभिन्न पक्ष  अपने विवाद को जिस तरीके से निपटाते हैं वह सभी पक्षों को मान्य होता है, वे उसे  अपनाते है ।  
 
                                       मध्यस्थता में मामले सुलाह, समझौते, समझाइश, सलाह के आधार पर निपटते हैं दोनो पक्ष जिस ढंग से विवाद सुलझाना चाहते है उसी ढंग से विवाद का निराकरण किया जाता है । इसमें विवाद की जड तक पहंुचकर विवाद के कारणों का पता लगाकर विवाद का हल निकाला जाता है ।
                                            मध्यस्थता माध्यस्थम् से अलग है । माध्यस्थम् में दोनो पक्षकार को सुनकर विवाद का हल निकाला जाता है । इसके लिए करार में माध्यस्थम् की शर्त होना अनिवार्य है। माध्यस्थम् में विवाद से बाहर की विषय वस्तु पर विचार नहीं किया जाता है और न ही उसके आधार पर विवाद का निराकरणा किया जा सकता है ।
                                               मध्यस्थता पंचायत से भी अलग है। पंचायत में समाज में व्याप्त रूढियों, प्रथाओं, मान्यताओं, को ध्यान में रखते हुए निर्णय जबरदस्ती पक्षकारो पर थोपे जाते हैं। पंचायत में सामाजिक प्रथाओ को ध्यान मंे रखकर दबाव वश निर्णय लिये जाते हैं । समस्या की जड तक पहंुचकर समस्या को जड से समाप्त नहीं किया जाता है । 

                                         मध्यस्थता लोक अदालत से भी अलग है । लोक अदालत में कानून के अनुसार केवल राजीनामा योग्य मामले रखे जाते हैं । इसमे पक्षकारो का सामाजिक आर्थिक हित होते हुए भी कानून में प्रावधान न होने के कारण कोई सहायता प्रदान नहीं की जा सकती। केवल कानून के दायरे में रहते ही लोक अदालत में निर्णय पारित किया जाता है । 

                                     मध्यस्थता न्यायिक सुलह से भी अलग है ।न्यायिक सुलह में सुलहकर्ता न्यायिक दायरे मंे रहते हुए दोनो पक्षकारो को सुनकर विवाद का हल बताता है । जो प्रचलित कानून की सीमा के अंतर्गत होता है । 

                                       मध्यस्थता समझौते से भी अलग है। समझौते में किसी पक्षकार को कुछ मिलता है । किसी को कुछ त्यागना पडता है । किसी को परिस्थितिवश समझौता करना पडता है । इसमें दोनो पक्षकार संतुष्ट नहीं होते है । एक न एक पक्षकार असंतुष्ट बना रहता है । 

                                     मध्यस्थता में जो रास्ते उपलब्ध है उन्हीं रास्ते में समस्या  का हल निकाला जाता है । मध्यस्थता में व्यक्तिगत राय  मध्यस्थ नही थोपता है । न ही कानून बताकर कानून के अनुसार कानून के दायरे में रहकर समस्या का हल निकालने को कहा जाता है । इसमें वैकल्पिक न्यायिक उपचार निकाले जाते है जो विवाद से संबंधित भी हो सकते हैं और विवाद की विषय वस्तु से अलग भी हो सकते हैं । इसमें वैचारिक मत भेद समाप्त कर दोनो पक्षकारो को पूर्ण संतोष एंव पूर्ण संतुष्टि प्रदान की जाती है । 

                                       मध्यस्थता में मध्यस्थ तठस्थ रहकर विवादों का निराकरण करवाता है । इसमें गोपनीयता महत्वपूर्ण है । किसी भी पक्षकार की गोपनीय तथ्य बिना उसकी सहमति के दूसरे पक्ष को नहीं बताये जाते हैं । इसमें तठस्थता भी महत्वपूर्ण है । तठस्थ रहकर बिना किसी पक्षकार का पक्ष लिए समझौते का हल निकाला जाता है । इसमें  मध्यस्थ के द्वारा कोई पहल नही की जाती है, कोई सुझाव नही दिया जाता है। दोनो पक्षों की बातचीत के आधार पर हल निकाला जाता है। 


        मध्यस्थता के निम्नलिखित चार चरण हैंः- 


    1.    परिचय- मध्यस्थता में सर्व प्रथम पक्षकारो का परिचय लिया जाता है । परिचय के दौरान पक्षकारो को मध्यस्थता के आधारभूत सिद्धात बताये जाते है जिसमें मध्यस्थता के फायदे, गोपनीय तथ्यों को गोपनीय रखे जाने, सस्ता सुलभ शीघ्र न्याय प्राप्त होने, न्यायशुल्क की वापसी होने आदि बाते बताई जाती है । 

    2.    संयुक्त सत्र-परिचय के बाद संयुक्त सत्र में दोनो पक्षों को उनके अधिवक्ताओ के साथ आमने सामने बैठाकर क्रम से उनका पक्ष सुना जाता है। इसमें पक्षकारो कोआपस में वाद विवाद करने, लडने की मनाही रहती है। स्वस्थ वातावरण में दोनो पक्षों की बातचीत  मध्यस्थ सुनता है । इसमें बिना  मध्यस्थ की अनुमति के दोनो पक्षकार आपस में वाद विवाद नहीं कर सकते है जो भी बात कहनी है वह  मध्यस्थ के माध्यम से कही जायेगी। इसमें विवाद के प्रति जानकारी प्राप्त की जाती है एंव विवाद के निपटारे के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जाता है । 

    3.    पृथक सत्र- संयुक्त सत्र के बाद अलग सत्र होता है जिसमें एक एक पक्षकार को उनके अधिवक्ताओ के साथ अलग-अलग सुना जाता है । इसमें  मध्यस्थ तथ्यों की जानकारी एकत्र करता है । पक्षकारो की गोपनीय बाते सुनता समझता है ।झगडे के कारणो से अवगत होता है । समस्या का यदि कोई हल हो तो वह खुद पक्ष्कार  मध्यस्थ को बताते है । इस सत्र में मध्यस्थ अधिकारी विवाद की जड तक पहुंचता हैं ।

    4.    समझौता-विवाद के निवारण उपरांत मध्यस्थ अधिकारी सभी पक्षों से समझौते की पुष्टि करवाता है तथा उसकी शर्ते स्पष्ट करवाता है । इस समझौते को लिखित रूप से अंकित किया जाता है ।जिस पर सभी पक्ष अधिवक्ताओं सहित हस्ताक्षर करते हैं ।
       
            मध्यस्थ अधिकारी की भूमिका और कार्य 

        मध्यस्थ अधिकारी विवादित पक्षों के बीच समझौते की आधार भूमि तैयार करता है। पक्षकारो के बीच आपसी बातचीत और विचारो का माध्यम बनता है । समझौते के दौरान आने वाली बाधाओं का पता लगाता है । बातचीत से उत्पन्न विभिन्न समीकरणों को पक्षों के समक्ष रखता है ।सभी पक्षों के हितों की पहचान करवाता है । समझौते की शर्ते स्पष्ट करवाता है तथा ऐसी व्यवस्था करता है कि सभी पक्ष स्वेच्छा से समझौते को अपना सके । 


                                 एक मध्यस्थ फैसला नहीं करता क्या न्याससंगत और उपयुक्त है, संविभजित निन्दा नहीं करता, ना ही किसी गुण या सफलता को संभावना की राय देता है । 

                               एक मध्यस्थ उत्प्रेरक की तरह दोनो पक्षों को एक साथ लाकर परिणामों की व्याख्या करके एंव बाधाओ को सीमित करते हुए विचार विमर्श द्वारा समझौता कराने का कार्य करता है। 

                           इस प्रकार मध्यस्थ का कर्तव्य है कि वह पक्षकारो को इस गलत फहमी से निकाले की
         
                               मध्यस्थता के संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा-89 में विशेष प्रावधान दिये गये है । जिसमें न्यायालय के बाहर विवादो का निपटारा किया जाता है ।

1-        धारा-89 सिविल प्रक्रिया संहिता के अनुसार जहां न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि प्रकरण में किसी ऐसे समझौते के तत्व विद्यमान है जो दोनो पक्षकारो को स्वीकार्य हो सकता है वहां न्यायालय समझौते के निबंधन बनाएगा और उन्हें पक्षकारों को उनकी टीका टिप्पणी के लिए देगा और पक्षकारों की टीका टिप्पणी प्राप्त करने के पश्चात न्यायालय संभव समझौते के निबंधनपुनः तैयार कर सकेगा और उन्हें निम्न लिखित के लिए निर्दिष्ट करें- 

    क-    माध्यस्थम्,
    ख-    सुलह,
    ग-    न्यायिक समझौते,जिसके अंतर्गत लोक अदालत के माध्यम से समझौता भी
        शामिल है,
    घ-    बीच-बचाव, 

                   वैकल्पिक न्यायिकेतर उपाय के सबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 10 में नियम 1क, 1ख, और 1ग जोडे गये है जो इस प्रकार है- 

                         आदेश 10-1क----वैकल्पिक विवाद प्रस्ताव का कोई एक तरीका अपनाने का न्यायालय का निर्देश-स्वीकृति और इन्कार को लेखबद्ध करने के बाद न्यायालय वाद से संबंधित पक्षकारो को धरा-89 की उपधारा 1 में उल्लिखित न्यायाल से बाहर सुलह समझौता के किसी तरीके का विकल्प देने का निर्देश देगा । पक्षकारो के विकल्प देने पर, न्यायालय ऐसे न्यायमंच फोरम या प्राधिकारी के समक्ष उपस्थिति की तारीख नियत करेगा, जैसा पक्षकारों ने विकल्प दिया है । 

                          आदेश 10-1ख----सुलह/समझौता न्यायमंच या प्राधिकारी के समक्ष उपस्थिति-जहंा नियम 1क के अधीन किसी वाद को संदर्भित किया गया हो तो उस वाद में सुलह करने के लिए पक्षकार उस अधिकरण न्यायमंच या प्राधिकारी के समक्ष  उपस्थित होगे। 

                                  आदेश 10-1ग----सुलह के प्रयासो के असफल होने के परिणामस्वरूप न्यायालय के समक्ष  उपस्थिति- जहां नियम जहंा नियम 1क के अधीन किसी वाद को संदर्भित किया गया है और उस सुलह न्यायमंच या प्राधिकारी का समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में उस मामले में आगे बढना उचित नहीं होगा, तो वह उस मामले को वापस उस न्यायालय को संदर्भित करेगा और पक्षकारो को उसके द्वारा नियत दिनाक को न्यायालय के समक्ष  उपस्थित होने का निर्देश देगा । 


                          क-    माध्यस्थम्- जहां कोई मामला कोई माध्यस्थ् या सुलह के लिए निर्दिष्ट किया गया है वहां माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम 1996 का 26 के उपबंध ऐसे लागू होंगे मानो माध्यस्थम् या सुलह के लिए कार्यवाहिया उस अधिनियम के उपबंधों के अधीन समझौते के लिए निर्दिष्ट की गई थीं, इस अधिनियम की धारा-73 के अनुसार निपटारे के तथ्य विद्यमान होने पर करार का निष्पादन किया जायेगा । 

                          ख-    सुलह- सुलह के अंतर्गत कोई करार न होने की दशा में मामला किसी तीसरे पक्षकार के समक्ष सुलह हेतु भेजा जायेगा । इसके लिए आवश्यक है कि एक पक्षकार के निमंत्रण पर दूसरा पक्षकार लिखित में आमंत्रण स्वीकार करना चाहिए । सुलाह कर्ता का नियुक्ति सहमति से की जायेगी ।सुलहकर्ता विवादो को मेत्री पूर्ण ढंग से स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से निपटाने में सहयोग प्रदान करेगा । 

                         ग-    न्यायिक समझौते जिसमें लोक अदालत भी शामिल है- न्यायालय प्रकरण को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 का 39 की धारा-20 की उपधारा- 1 के उपबंधों के अनुसार लोक अदालत को निर्दिष्ट करेगा और उस अधिनियम के सभी अन्य उपबंध लोक अदालतों को इस प्रकार निर्दिष्टि किए गए विवाद के संबंध में लागू होंगे, जहां न्यायिक समझौते के लिए निर्दिष्ट किया गया है, वहां न्यायालय उसे किसी उपयुक्त संस्था या व्यक्ति को निर्दिष्ट करेगा और ऐसी संस्था या व्यक्ति लोक अदालत समझा जाएगा तथा विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 का 39 के सभी उपबंध ऐसे लागू होंगे मानो वह विवाद लोक अदालत को उस अधिनियम के उपबंधों के अधीन निर्दिष्ट किया गया था, 

                           लोक अदालत का प्रत्येक अधिनिर्णय  विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 का 39 अधिनियम की धारा-21 के अंतर्गत किसी सिविल न्यायालय की एक डिक्री माना जायेगा । 

                 घ-    बीच-बचाव-बीच बचाव के लिए निर्दिष्ट किया गया है, वहां न्यायालय पक्षकारो के बीच समझौता राजीनामा कराएगा और ऐसी प्रक्रिया का पालन करेगा जो विहित की जाए। 

                           इस प्रकार धारा-89 सहपठित आदेश 10 नियम 1क, 1ख, 1ग, मंे न्यायालय के बाहर समझौता या राजीनामा के आधार पर विवाद निपटाने की नवीन व्यवस्था की गई है जिसमें मुकदमे बाजी को कम समय में आपसी मेल जोल के वातावरण में सद्भावना पूर्वक विवाद को निपटाया जाता है ।

                           धारा-89 के अंतर्गत राजीनामा समझौते से जो मामले निपटते है उनमें वादी को पूरी न्यायशुल्क की पूरी राशि वापिस की जाती है ।

                       इस संबंध में विधिक सेवा प्राधिकरण 1987 की धारा-20-1 के अनुसार किसी लोक अदालत में द्वारा कोई समझौता या परिनिर्धारण कियाजाता है तो ऐसे मामले में संदत्त न्यायालय फीस, न्यायालय फीस अधिनियम 1870 का 7 के अधिन उपबंधित रीति में वापस की जायेगी ।

                    इस संबंध में न्यायालय जिला कलेक्टर को प्रमाण पत्र जारी करेगा। 

        मध्यस्थता धारा-89 के अंतर्गत सुलाह समझौते का एक महत्वपूर्ण आधार है । जिसके संबंध में मान्नीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा एस.एल.पी.नंबर-6000/2010 सी नंबर-760/2007 एफकाॅम इन्फ्रास्ट््रेेक्चर लिमि. विरूद्ध चेरियर वारके कार्पोरेशन प्राईवेट लिमि.2010 भाग-8 एस.एस.सी.24 के मामले में अभिनिर्धारित किया है कि यह एक महत्वपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया है जिसका पालन कराया जाना राजीनामा वाले मामलो में अनिवार्य है । इस मामले में भी ऐसे मामलो की सूचि दी गई है जिनमें मध्यस्थ के मामले की प्रक्रिया का पालन कराया जाना चाहिए और यह भी बताया गया कि किन मामलो में इसका पालन आवश्यक नही है । 

        मध्यस्थता के लिए उपयुक्त मामलो में जैसे 

        1. दीवानी मामले, निषेधादेश या समादेश, विशिष्ट निष्पादन, दीवानी वसूली, मकान मालिक किरायेदार के मामले, बेदखली के मामले,
        2. श्रमिक विवाद
        3. मोटर दुर्घटना दावे,
        4. वैवाहिक मामले, बच्चो की अभिरक्षा के मामले, भरण-पोषण के मामले,
        5. अपराधिक मामले, जिनमें धारा-406,498ए भा.द.वि. एंव. पराक्रम लिखत अधि            नियम की धारा-138 के मामले, धारा-125 दं.प्र.स. भरण-पोषण के  मामले, 

    निम्नलिखित मामले मध्यस्थता हेतु उपयुक्त नहीं पाये गयेः- 

        1. लोकहित मामले,
        2. ऐसे मामले जिनमें शासन एक तरफ से पक्षकार है ।
        3. आराजीनामा योग्य धारा-320 द.प्र.सं. के अवर्णित मामले 

         प्रत्येक प्रकरण में मध्यस्थ की प्रक्रिया अनिवार्य है लेकिन यदि आवश्यक तत्व न हो तो  मध्यस्थ को भेजा जाना प्रकरण को आवश्यक नहीं है । इसमें पक्षकारो के मध्य विभिन्न कोर्ट में लंबित सभी मामले एक साथ निपटते हैं । कोर्ट फीस वापिस होती है । आदेश की अपील नहीं होती है ।

        मध्य प्रदेश शासन के द्वारा इस सबंध में 30.082006 के राजपत्र मंे नियम प्रकाशित किये गये हैं । दोनो पक्ष आपसी सहमति से एक मध्यस्थ को नियुक्त कर सकते है या मध्यस्थ द्वारा एक  मध्यस्थ विचाराधीन वाद के लिए नियुक्त किया जा सकता है।  मध्यस्थता हमेशा निर्णय लेने की क्षमता दोनो पक्षों को सौंप देती है । 

        सर्व प्रथम प्रत्येक जिले में एक मध्यस्थ केन्द्र की स्थापना की जायेगी । जिसका प्रभारी अधिकारी ए.डी.जे. स्तर का होगा । मध्यस्थ के लिए उपर्युक्त मामला पाये जाने पर संबंधित न्यायाधीश एक संक्षिप्त जानकारी सहित मामला मध्यस्थ जिले मे स्थापित मध्यस्थ केन्द्र के प्रभारी अधिकारी को भेजेगा । प्रभारी अधिकारी राष्ट््रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के  द्वारा नियुक्त एंव मान्यता प्राप्त मध्यस्थ को मामला सुपुर्द करेगा । 

        पक्षकारों को मध्यस्थ केन्द्र में उपस्थित होने की तारीख संबंधित न्यायाधीश   द्वारा दी जायेगी । मध्यस्थ द्वारा 60 के अंदर मामले को निराकृत करने का प्रयास किया जायेगा। पक्षकारो के विशेष अनुरोध पर 30 दिन ओर समयावधि बढाई जा सकती है । 90 दिन से ज्यादा समय मध्यस्थ कार्यवाही हेतु नहीं दिया जायेगा । 

        समझौता होने पर ज्ञापन मध्यस्थ कार्यालय में अभिलिखित किया जायेगा जिस पर केस नंबर, मध्यस्थ केन्द्र का केस नंबर, पक्षकारो के नाम, शर्तो का उल्लेख होगा और उस पर मध्यस्थ सहित सभी पक्षकार अधिवक्ताओ के हस्ताक्षर होगें । एक-एक प्रतिलिपि दोनो पक्षकारो को दी जायेगी । जो न्यायालय में प्रस्तुत करेंगे । तथा मध्यस्थ भी समझौते की एक प्रति न्यायालय को सीधे भेजेगी । न्यायालय विधि अनुसार समझौते के अनुसरण में समझौता डिक्री पारित करेगा । जिसकी अपील नही होगी ।



        जगदीश प्रसाद विरूद्ध संगम लाल आई.एल.आर. 2011 मध्य प्रदेश 3011 में अभिनिर्धारित किया गया है कि प्रत्येक लोक अदालत का अधिनिर्णय लिगल सर्विस अधार्टी एक्ट 1987 की धारा-20 और 21 के अंतर्गत सिविल न्यायालय की डिक्री की श्रेणी में आता है । 

        रमेशचंद विरूद्ध स्टेट आफ एम.पी. आई एल.आर. 2012 मध्य प्रदेश 320 में अभिनिर्धारित कियागयाहै कि धारा-35 कोर्ट फीस अधिनियम के अंतर्गत लोक अदालत में राजी नामा होने पर सम्पूर्ण राशि वापिस की जायेगी और लोक अदालत का निर्णय धारा-21 के अंतर्गत डिक्री की श्रेणी में आता है ।

मान्नीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा एस.एल.पी.नंबर-6000/2010 सी नंबर-760/2007 एफकाॅम इन्फ्रास्ट््रेेक्चर लिमि. विरूद्ध चेरियर वारके कार्पोरेशन प्राईवेट लिमि.2010 भाग-8 एस.एस.सी.24 के मामले में अभिनिर्धारित किया है कि यह एक महत्वपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया है जिसका पालन कराया जाना राजीनामा वाले मामलो में अनिवार्य है ।